Tuesday, October 23, 2018

जीवन पर एक कविता

दोस्तों आज हम आपके लिए लाएं हैं ज़िंदगी पर एक कविता। ये कविता मैंने जीवन के मूल्यों को ध्यान में रख कर लिखी है. जीवन वैसे भी एक कविता समान है, जिसकी अगर शुरुआत होती है तो अंत भी ज़रूर होता है. हम सब माटी के पुतले हैं. हमारा कोई मूल्य नहीं है. ये जीवन की कड़वी सच्चाई है. ये सभी बाते हम सभी को पता हैं पर हम जीवन की भाग दौड़ में भूल जाते है.  इस कविता को पढ़ कर बेशक आपको अच्छा लगेगा। आपका अपना धमेंद्र।

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ज़िंदगी- आपधापी का नाम.

इस आपाधापी भरे जीवन से,
भर गया मन हर मंजर से,
यहाँ सुबह भी भागती सी है,
रात भी जागी जागी सी है,
सुकून भी यहाँ सुकून ढूंढ़ता हैं,
एहसास भी यहाँ एहसास से खाली है,
अंधी दौड़ ये पथ रहित ही है,
हर अभिलाषा खोई खोई सी है,
किताब के चार अक्षर याद कर के,
ज़िंदगी का सार ही भुला बैठे हम,
क्या पाना है कहाँ जाना है,
इस सावल का न कोई ठिकाना है,
यंत्रों में उलझ कर हम यंत्र हुए,
महत्वकांक्षा की आग में सब जल रहे,
बड़ी बड़ी इमारतों में हम आ गए,
छोटी छोटी खुशियाँ पीछे छोड़ आये,
पर्व भी आज कल सिर्फ यंत्रों में ही मनते हैं,
लोगों को सामने देख चेहरा ही छुपा लेते हैं,
कहने को छू लिया आज हमने चाँद, पर,
ठीक से जमीन पर चलना न आया हमें,
ये इंसानी चोले में कौन है समाया,
खुदा ने इंसान ऐसा तो नहीं था बनाया,
क्यों हम आज रगड़े झगडे में पड़े रहते हैं,
हर वक़्त एक दूसरे को काटने में लगे रहते हैं,
भूल गया इंसान खाली आया था खाली जायेगा,
मुट्ठी में भर के एक तक तिनका ना ले जा पायेगा,
अभी वक़्त है संभल जा ऐ इंसान,
नहीं तो आएगा कुदरत का तूफ़ान,
न तू बचेगा न तेरी हस्ती,
धरी की धरी रह जायेगी सारी तेरी पूंजी।
-धर्मेंद्र 

दोस्तों आपको हमारी ये कविता किसी लगी कमैंट्स में ज़रूर बताइयेगा।









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