Friday, September 28, 2018

SUCCESS STORY:गरीबी से सरकारी नौकरी तक का सफर

        SUCCESS STORY:गरीबी से सरकारी नौकरी तक का सफर

आज हम लाये हैं एक बहुत ही मोटिवेशनल और एक खास इंसान की सक्सेस स्टोरी। ये कहानी पढ़ने के बाद आप बहुत ही प्रेरित महसूस कहेंगे। यहाँ हम प्रसिद्ध लोगों की सक्सेस स्टोरीज डालने की जगह बहुत ही आम लोगों की सक्सेस स्टोरीज डालेंगे। ये वो लोग होंगे जो अपनी मेहनत के दम पर आम से ख़ास बने. आप अपने आस पास के लोगों, या मित्रों की ऐसी ही सफलता की कहानी हमें भेज सकते हैं जिसे हम अपने ब्लॉग पर नाम और फोटो के साथ पोस्ट करेंगे। ऐसे सभी लोग हम सब के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं जिंहोने जीवन की अनंत कठनाइयों का सामना करने के बावजूद भी एक मुकाम पाया और कुछ कर दिखाया।

आज हम जिस इंसान की कहानी बताने जा रहे हैं उनका नाम और अरुण कुमार हैं. अरुण जी आज भारतीय जीवन बीमा निगम(एल.आई.सी.) में विकास अधिकारी के पद पर कार्यत है. तो आइये दोस्तों जानते हैं इनके जीवन की सफलता की कहानी।






बचपन: दोस्तों उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड जैसे पिछड़े इलाके में 1963 में  जन्मे श्री कुमार जी एक बहुत ही गरीब परिवार से थे. आज 2018 में बुंदेलखंड की स्तिथि दयनीय है तो आप अंदाजा लगा सकते हैं की आज से 60 वर्ष पहले की स्तिथि क्या रही होगी। कुमार जी के परिवार में 6 भाई और 2 बहनें थीं. अरुण जी अपने परिवार में सबसे बड़े थे. घर में कृषि ही एक मात्र आय का स्त्रोत था और घर की आर्थिक स्तिथि भी बेहद ख़राब थी. उस गाँव में पढ़ने के लिए एक मात्र  सरकारी स्कूल था वो भी घर से 10 किलोमीटर दूर था. खानदान में आज तक कोई पांचवी से ज्यादा न पढ़ा था तो परिवार ने पढाई लिखाई के लिए कभी भी अनुमति न दी. कुमार जी ने किसी तरह अपने पिता जी से अनुमति ले पहली कक्षा में दाखिला ले लिया। समय गुजरता गया और कुमार जी ने आठवीं की परीक्षा पास कर ली. आठवीं के बाद गाँव में कोई स्कूल ही नहीं था तो उनके पिता जी ने आगे खेती करने को कहाँ। पर विलक्षण प्रतिभा के धनी और कुछ करने की ललक लिए कुमार जी गाँव छोड़ शहर आ गए. वहां उन्होंने एक सरकारी स्कूल में दाखिला ले लिया। उनका परिवार उनके इस फैसले से सख्त नाराज़ था.



पोस्ट ग्रैजुएशन तक का सफर: दोस्तों, शहर में रहना आसान न था. आर्थिक आय का कोई स्त्रोत न होने के कारण कुमार जी दूसरों के घरों से गोबर ला कर  कंडे (गाय के गोबर से बना सामन जो आग जलने के काम आता है) बनाकर बेचने लगे. उससे जो आय होती थी उससे वो अपनी फीस भर देते थे. तब फीस 5 रूपए हुआ करती थी. धीरे धीरे कुमार जी ने अन्य बच्चो को टूशन पढ़ाना स्टार्ट कर दिया। दो साल बाद वे अपने गाँव के पहले बच्चे थे जिन्होंने हाई स्कूल की परीक्षा पास कर ली थी. उस जवाने में उत्तर प्रदेश बोर्ड से हाई स्कूल पास कर लेना बहुत बड़ी बात थी.
कुमार जी पढ़ाई के साथ साथ अपने पिता के साथ कृषि के काम में भी संग बराबर हाँथ बटाते थे. अपने छोटे भाइयों की चिंता भी उन्हें हमेशा रहती थी. पर विडंबना ये रही की कुमार जी को छोड़ उनका कोई भाई आगे पढ़ न सका. अरुण कुमार जी ने अपने भाइयों को पढ़ाने का खूब प्रयास किया पर गलत संगत में लीप्त 3 भाई घर छोड़ के दिल्ली भाग गए. कुमार जी के हाई स्कूल पास करते ही उनके पिता जी ने भी अन्य बच्चो को पढ़ाने का प्रयास किया पर ऐसा न हो सका. धीरे धीरे कुमार जी ग्रेजुएट भी हो गए. ग्रेजुएशन के बीच में ही उनके पिता जी ने जबरन उनका विवाह भी करवा दिया। अब उनके पास परिवार की भी जिम्मेदारी आ पड़ी थी.



नौकरी तक का संघर्ष: दोस्तों कुमार जी पर अब किसी तरह नौकरी करने का दबाव था. अब वो पोस्ट ग्रेजुएट भी हो चुके थे. उनके पिता जी उन्हें अब भी खेती करने के लिए ही कह रहे थे. कुमार जी भी अडिग थे की एक सम्मान जनक सरकारी नौकरी ही उन्हें करनी है. जिसके लिए दिन रात उन्होंने प्रयास भी किये और सही दिशा में तयारी भी की.
1984 में पोस्ट ग्रेजुएशन होने के बाद उन्होंने दर्जनों फार्म भरे. इंटरव्यू भी दिए पर कहीं सफलता नहीं मिली। एक बार वो उत्तर प्रदेश से विजयवाड़ा परीक्षा देने जा रहे थे तो रास्ते में ट्रैन लेट होने के कारण उनके सारे पैसे ख़त्म हो गए. परीक्षा देकर लौटते वक़्त उनके पास खाने तक के पैसे न बचे थे. तब 2 दिन तक भूखे पेट सफर कर के किसी तरह वो अपने शहर पहुंचे और अपने मित्र के यहाँ पहुंच खाना खाया। ना जाने कितने ऐसे सफर किये पर 1990 तक उन्हें कोई सफलता न मिली। अंत में वो अपने परिवार समेत आगरा शहर  आ गए और एक प्राइवेट कंपनी में काम करने लगे. यहाँ भी उन्होंने सरकारी नौकरी के फॉर्म भरना ज़ारी रखा.



नौकरी मिलने का समय: दोस्तों एक किराये के मकान में अपने  परिवार के ले कर कुमार जी किसी तरह गुजर बसर कर रहे थे. एक दिन उन्हें अपने घर से संदेशा आया की कोई डाक आयी हुई है. कुमार जी उस वक़्त कंपनी में थे. वो में कुछ देर के लिए घर गए तो उन्होंने वो डाक वाला लिफाफा खोला। लिफाफा खोलते ही उनकी ख़ुशी का कोई ठिकाना न रहा. जो उन्होंने भारतीय जीवन बीमा निगम का विकास अधिकारी पद के लिए परीक्षा और साक्षात्कार दिया था उसमे वो सफल रहे थे. अब वो एक भारत की एकलौती (उस वक़्त एल.आई.सी. भारत की एकलौती जीवन बीमा कंपनी थी) जानी मानी सरकारी संस्था के कर्मचारी हो चुके थे. हाँ! उनकी अब सरकारी नौकरी लग चुकी थी. उनकी आंखों में ख़ुशी के आंसू थे. उनका पूरा परिवार आज बहुत खुश था. पूरे जीवन भर का संघर्ष आज अपना फल दे चुका था.  नौकरी लगते ही कुमार जी ने अपने पिताजी का पूरा क़र्ज़ चुकाया और परिवार के सारे भाइयों और दोनों बहनों की  शादियां की. नौकरी लगने के बाद भी उनका जीवन से संघर्ष जारी ही रहा. यहाँ गौर करने की बात ये है की उनके परिवार का कोई भी भाई उनसे सीख न ले पाया और जीवन में कुछ भी न कर सका. ऐसे माहौल से खुद को निकाल कर एक प्रतिष्ठित सरकारी नौकरी तक जाना वास्तव में अपने आप में एक मुकाम है.



दोस्तों, हम सब के घर में ऐसी कहानिया मौजूद हैं. आज कल के बच्चे जो लाइफ स्टाइल जीते हैं , वो कहीं न कहीं उनके पिता या माता के संघर्ष की वजह से ही है. हमें जरुरत है की हम अपने पिता के संघर्ष को समझें और ज़िंदगी में खूब आगे  जाएँ ताकि उन्हें भी हमारे ऊपर गर्व हो.

आपको अरुण कुमार जी के सघर्ष की कहानी जरूर प्रेरित करेगी। आज अरुण कुमार जी के बच्चे भी कामयाब हैं. उनके बच्चे कहते हैं की आज वो  जो भी यहीं अपने पापा की वजह से हैं. सलाम है ऐसे संघर्ष को. दोस्तों अरुण कुमार जी जैसे लोग हमारे देश के ही छुपे हुए हीरो हैं. आखिर ऐसे ही इंसान एक अच्छे समाज का निर्माण करते हैं. आइये हम ऐसे संघर्ष को लोगों तक पहुंचाए ताकि और लोग भी इससे प्रेरणा ले सकें।

दोस्तों आप भी हमें ऐसी ही संघर्ष की कहानियां info@baatonkaaashiyana.com पर भेजिए हम यहाँ उसे फोटो और नाम के साथ प्रकाशित करेंगे।

आपको अरुण कुमार जी की सफलता की कहानी कैसी लगी हमें कमैंट्स में ज़रूर बताएं। आपके कमैंट्स ही हमें और लिखने के लिए प्रेरित करते हैं.

हमें फेसबुक और ट्विटर पर भी जरूर फॉलो करें।

मिलते हैं दोस्तों हमारी अगली पोस्ट में.



No comments:

Post a Comment