Sunday, September 30, 2018

फक्क्ड़बाज़ी: जीवन जीने का नायब रास्ता

                             फक्कड़बाज़ी: जीवन को अलग नजरिया देने का एहसास 

कुछ मित्र अक्सर पूछते हैं कि ये फक्कड़बाज़ी क्या है?

आज इसी बात को दिल से निकालने के लिए ब्लॉग लिखा है कि आखिरकार ये फक्कड़बाज़ी क्या है? सच बताऊं तो फक्कड़बाज़ी जिंदगी जीने का सबसे मस्त तरीका है या यूँ कहें कि जिंदगी है जिसे हम शायद कोने में किसी खूटी के सहारे टांगकर भूल चुके हैं और वो हर रोज़ हमारी राह ताकते ताकते बूढ़ी होती जा रही है|
हम सबका जीवन व्यस्त या यूँ कहें कि अस्त व्यस्त हो चुका है इसमें कोई दो राय नहीं| समाज के सपने, घर के सपने, दोस्तों के सपने, अपनों के सपने आदि आदि पूरे करने की होड़ और दौड़ में हमनें खुद के अंदर झांककर अपने सपनों को समझना छोड़ दिया है या जानबूझकर IGNORE करना शुरू कर दिया है|






फक्कड़बाज़ी: जीवन जीने का एक "नशा": याद है जब मैं छोटा था तब मैं बहुत adventurous किस्म का था..आँखों में सपनों की बिजलियाँ कौंधती थीं, बनारस में नदी किनारे बैठकर सामने पानी में झांकता था और अपना भविष्य देखता था, मंच पर खुद को बोलते हुए देखता था, गाते हुए देखता था, घूमते हुए देखता था और सपनों की दुनिया को हकीकत में लाने की तरकीबें खोजता फिरता था| मुझे यकीन है कि हम सबमें से ज्यादातर लोग बचपन में ऐसे ही थे लेकिन फिर जैसे जैसे जवानी आती गयी और हम स्कूल, कॉलेज की जिंदगी के सबसे अच्छे पलों को बिताकर पेशेवर बोले तो Professional जिंदगी में आये तभी से ऐसा लगा कि जिंदगी में चरस बो दिया गया है| युवा बन गए तो फिर जानबूझकर बहुत ज्यादा शालीन, सभ्य, कोट पेंट वाला दिखने की कोशिश करने लगे जैसा अमूमन लोग युवाओं से अपेक्षा भी रखते हैं लेकिन कहीं न कहीं अंदर का शख्स हर रात आकर कहता था, क्या कर रहा है बे..क्या इसलिए ही इतना हसीन जीवन मिला था कि काम कर, खा और सोजा..हर रोज़ ये बच्चा आकर दिल के किसी कोने तक झकझोर देता था| हम रोज़ हजारों लोगों से मिलते मिलते खुद से मिलने का समय नहीं निकाल पाते और जिस दिन खुद से मिल लेते हैं उस दिन जरूर इस बात का एहसास होता है|

बचपन के मित्रों की बात करूँ तो कई लोगों को गाने से प्यार था लेकिन शादी उन्होंने दवाइयों से कर ली और डॉक्टर बन गये, कई लोगों को बास्केटबाल खेलने से प्रेम था लेकिन बीमा कम्पनी से शादी कर ली और कई लोगों को कविताओं और गजलों से प्रेम था लेकिन बैंक से शादी कर ली| ये सब मजबूरी और वक्त की नजाकत को देखकर लिए गये फैसले थे और जीवन जीने के लिए बहुत जरूरी फैसले थे इसमें को दो राय नहीं|

खुद से खुद की पहचान कराती है फक्कड़बाज़ी: दुनिया में शौक पूरा करना बहुत बड़ी चीज़ है और उस शौक के पैसे देने वाला ढूंढना उससे भी बड़ी चीज़ है| हर किसी को अपने शौक पूरे करने के पैसे मिलें ऐसा जरूरी नहीं| हालाँकि बड़े बड़े महान लोगों ने कहा है कि वो काम करो जिससे प्यार करते हो तो जिंदगी में एक भी दिन काम करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी क्योंकि तब तुम काम नहीं बल्कि प्रेम कर रहे होगे| लेकिन किसी महापुरुष ने ये भी कहा है कि भूखे पेट न भये गोपाला, धर लो अपनी कंठी माला|

खैर, गाने वाला डॉक्टर बन गया या कविता वाला बैंकर बन गया तो इसका ये मतलब नहीं कि उसके शौक, उसके जूनून के घर में कोई रौनक होना बंद हो जाए| बल्कि, ये तो बहुत सकारात्मक बात है कि वो आर्थिक रूप से स्वतंत्र है और अब शौक को खुलकर बेफिक्री से पूरा कर सकता है| बस जूनून की आग में समय का घी डालने भर की देरी है| बस रोज़ कुछ समय अपने शौक के लिए निकालें, कभी कभी बिना प्लान किये ट्रिप पर जाएँ, शान्ति में खुद को खोजने का प्रयास करें, अपने शौक को लोगों के साथ पूरा करें| ये जीवन में catalyst की तरह कार्य करेगा|

फक्कड़बाज़ी जीवन जीने का बेफिक्र तरीका ही है| कहते हैं न कि कई लाख योनियों के बाद मनुष्य का जीवन मिलता है तो इसे सिर्फ इसलिए इस्तेमाल तो नहीं करना चाहिए कि रोज़ सुबह जाकर काम किया, घर आये, खाए और सो गये| अपना काम पूर्ण निष्ठा के साथ और सच्ची लग्न के साथ करें क्योंकि कर्म ही पूजा है लेकिन कुछ समय फक्कड़बाज़ी को भी दें क्योंकि जीवन की घड़ी में कब बैट्री खत्म हो जाए पता नहीं.


बेफिक्री का दूसरा नाम है फक्कड़बाज़ी: मेरा एक सबसे ख़ास दोस्त है उपेन्द्र अवस्थी| उसकी एक बात मुझे बहुत अच्छी लगती है और इस बात को मैं हर रोज़ एक बार जरूर सोचता हूँ| वो कहता है कि जब तुम्हारा अंत आएगा तब तुम्हें ये याद नहीं रहेगा कि तुमने कितने पैसे कमाए, कितनी बार ऑफिस गये, कितनी बार बीवी के साथ डिनर किया बल्कि तुम्हें उस समय ये याद आएगा की तुमने दुनिया कितनी देखी..तुमने कितने शौक पूरे किये..तुम्हारा कोई जूनून अधूरा तो नहीं रह गया|
अवस्थी जी की ये बात जीवन में उतारने और आत्मसात करने की आवश्यकता है| आपाधापी ने कहीं न कहीं हमें हमारे सपनों से दूर कर दिया है|

आज से एक साल पहले मैं भी फिक्रमंद जीवन जीता था कि आखिर क्या होगा, कैसे होगा, ये काम अधूरा रह गया, वो काम पूरा नहीं हुआ आदि आदि आदि लेकिन फिर जीवन में कई ऐसी घटनाएँ देखीं जिसके बाद लगा कि जीवन वाकई बहुत छोटा है और इसे किसी और के सपनों में जीते हुए व्यतीत करने से बेहतर है अपने सपनों में जीकर मौज से बिताने में|
अपने छोटे छोटे सपने, शौक, जूनून किसी डायरी में लिखिए और उन्हें पूरा करने के प्लान बनाइए| कई बार शौक बड़े बचकाने होते हैं और हम डरते हैं कि आखिर लोग क्या कहेंगे? लेकिन फ़िक्र न कीजिये, लोग तो हमेशा कुछ न कुछ कहेंगे| बचकाने शौक हो चाहे बुढ़ापे वाला लोगों को बोलना ही बोलना है..सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग |
इस रोग के संक्रमण में मैं भी घिरा था लेकिन जब से फक्कड़बाज़ी में चूर हुआ तब से इस तरफ ध्यान हटने लगा| मेरा एक शौक था कि मैं बर्फ में जाकर सलमान भाई की तरह शर्ट उतारकर नाचूं| कई लोगों के लिए ये मजाक था, कई लोगों के लिए पागलपन लेकिन मेरे लिए सपना था, मौज थी, फक्कड़पन था और मैंने बड़े मजे से उसे पूरा किया| बर्फ की एक ऊंची सी छोटी पर जाकर मैंने जी भरकर नाचा और अपना एक जूनून पूरा कर लिया| कई दोस्तों ने कहा कि लोग क्या कहेंगे लेकिन क्या करूँ जूनून जब आँखों में पाला था तब किसी से पूछकर नहीं पाला था.
ये ही फक्कड़बाज़ी है जहाँ भले ही जेब खाली हो लेकिन अनुभवों की पोटली भरी रहती है, सुकून वाला बैंक बेलेंस फुल रहता है और अंतर्मन खुशियों के फलक पर पहुँच जाता है| कुछ खोने को नहीं होता और कुछ पाने की इच्छा नहीं रहती|
कुल मिलाकर एक ऐसा जीवन हो कि जिस दिन यमराज लेने आये तब हम गर्व से कह सकें, आहा क्या जिंदगी दी थी!! मजा आ गया, जय हो 
Last but not the least, 

फककड़बाज़ी से तुझे मिलता है क्या?
बाबु, सुकून मिलता है, सुकून 

‘जूनून जो आँखों में बसा है वो मोती है,
ये जूनून पूरा कर लो जिंदगी छोटी है’

We are very thankful सागर गुजराती   for sharing such a awesome and motivating article to our blog बातों का आशियाना।

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