Friday, September 21, 2018

बचपन-एक कविता

                                                             बचपन-एक कविता 

दोस्तों, आज कल की भागती दौड़ती ज़िंदगी में दो पल सुकून के निकाल पाना बहुत ही कठिन है. कब सुबह से शाम हो जाती है और शाम से सुबह पता ही नहीं चलता। ऐसे में कुछ भी लिखने पढ़ने के लिए वक़्त निकालना मुश्किल होता है. पर जीवन  को नया आयाम देने के लिए ये सब बहुत जरुरी है.

याद कीजिये अपना बचपन जब हम कितने बेबाक होते थे. हमारी खुसी सिर्फ एक टॉफी या पतंग तक ही सीमित होती थी. हमें तब छोटी छोटी चीज़ों में बड़ी बड़ी खुशियां मिलती थी, और अब हम बड़ी बड़ी चीज़ों में छोटी छोटी खुशियां ढूढ़ते रहते है. दो पल रुक कर याद कीजिए दोस्तों की लास्ट टाइम आप खुश कब हुए थे. पूरे मन से. याद आया? सोचना पड़ा ना!

आज नीचे अपनी कलम से लिखी एक कविता से आपको पुराने दिनों  में ले जाने का प्रयास है!




जीते तो बचपन में थे,
अब तो जिंदगी काटा करते  हैं,
नींद तो माँ की गोद में आती थी,
अब तो बस सो जाय करते हैं,
दोस्त तो बचपन में थे,
अब बस काम निकाला करते हैं,
तब रिश्तों नातों की समझ न थी,
अब सब समझ के निभाया करते  हैं,
तब हर वक़्त हंसी होठों पर थी,
अब बस मुस्कुरा दिया करते हैं,
त्यौहार तो बचपन मनाया करते थे,
अब तो बस दिन काटा करते हैं,
तब पटाखे फोड़ा करते थे,
अब तो बस देख के मुस्कुराया करते है,
माँ की लोरी में जो एहसास था,
अब एयर फोन लगाने में वो एहसास कहाँ,
अकड़ बक्कड़ में जो बात थी,
वो गूगल प्ले के डाउनलोड में कहाँ,
तब जमीन पर लेट कर ,
रात में आसमान निहारा करते थे,
आज फ्लैट के सातवीं मंज़िल से,
ज़मीन को निहारा कतरे हैं,
कभी ना खत्म होने वाली इस दौड़ में,
ना जाने कैसे शामिल हुए हम,
जीते जीते बहुत दूर निकल आये हम,
अपने बचपन को ना जाने कहाँ छोड़ आये हम 
-धर्मेंद्र  प्रसाद 

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